Monday, April 6, 2009

माँ

मुझे टुकडो में बाँट दिया ज़िन्दगी ने मेरी,

मुकम्मल जहान थी मेरी माँ की गोद मेरी,

मैं तो मासूम था बच्चे की जिद की तरह ,

मैं भी बदल गया बदल गई जिद मेरी,

उसके दामन में सारा आसमा चमकता था जैसे,

कब लगती थी सुकून से कुब खुलती थी आँख मेरी,

उसके हाथो की नरमाहट उसकी डांट में भी मिठास,

मेरे रोने पर रोती मेरी हसने पर हसती माँ मेरी ,

अब वो सुकून वो रहत मिटटी के निचे दबा है,

वो बड़े मकाम पर है वो मकामे इल्तिजा है,

मुझे कुछ न रहे याद पर याद है माँ मेरी,,,,,,

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